Monday, March 7, 2011

बड़ी बारीक हैं वाइज़ की चालें

अजब वाइज़ की दीँदारी है  या  रब
अदावत  है  इसे  सारे जहाँ  से

कोई  अब  तक  न  ये  समझा  क  इन्सां
कहाँ  जाता  है  आता  है  कहाँ  से  
 
वहीँ  से  रात  को  ज़ुल्मत  मिली  है
चमक  तारों  ने  पाई  है  जहाँ  से

हम  अपनी  दर्दमंदी  का  फ़साना
सुना  करते  हैं  अपने  राजदां  से

बड़ी  बारीक  हैं  वाइज़ की  चालें
लरज़  जाता  है  आवाज़े अजाँ  से  
Allama Iqbal