Tuesday, August 9, 2011

बच्चे मेरे अहेद के चालाक बहुत हैं

मैं  न  जुगनू  हूँ ,दिया  हूँ न कोई  तारा  हूँ
रौशनी  वाले  मेरे नाम से जलते  क्यूँ  हैं
Raahat Indori

आइने  के  सौ  टुकडे  करके  हमने  देखे  हैं
एक  में  भी  तनहा  थे  सौ में भी अकेले  हैं

कुछ  इस  तरह  से  किया  उसने  मेरे  ज़ख्मों   का  इलाज 
मरहम   भी  लगाया   तो   कांटे   की   नोके   से 

दिन  में जुग्नुवों  को  परखने  की जिद  करें 
बच्चे  मेरे अहेद  के चालाक  बहुत  हैं

तश्नगी   मेरी   बुझादे   तो  मैं  जानू   वरना
तू  समंदर  है  तो  होगा  मेरे किस  काम  का है
 
Unknown

Saturday, July 23, 2011

बुरे वक़्त में एक तू रह गई है

अरी बेकसी तेरे कुरबान जाऊं
बुरे वक़्त में एक तू रह गई है
Sharafuddin Ilhaam
ग़म है आवारह अकेले  में  भटक  जाता  है
जिस जगह रहिए वहां मिलते मिलाते रहिए
Nida Faazli

Monday, July 11, 2011

सब हम से हैं जियादा, कोई हम से कम नहीं

था  नाज़  बहुत हम  को  दानिस्त पर अपनी भी
आखिर वह बुरा निकला हम जिस को भला जाना
Mir
नहीं जाती मताए लालो गौहर की गिरां याबी
मताए  गैरतो  ईमाँ  की अर्जानी  नहीं  जाती
Faiz Ahmad Faiz
उम्र  हमारी  सहराओं  में रेत  हुई
घर वालों ने ताज महल तामीर किया
Yaqub Tasawwur
ऐ ज़ौक  किस  को  चश्मे हिकारत से देखिए
सब हम से हैं जियादा, कोई हम से कम नहीं
Shaikh Ibrahim Zauq

Wednesday, June 22, 2011

जब माल बहुत था तो सखावत भी बहुत थी

ज़ालिम   था  वो  और  ज़ुल्म  की  आदत  भी  बहुत  थी
मजबूर  थे  हम  उस  से  मुहब्बत  भी  बहुत  थी 
उस  बुत  के  सितम  सह  के  दिखा  ही  दिया  हम  ने
गो  अपनी  तबिय्यत  में  बग़ावत  भी  बहुत  थी
वाकिफ़  ही  न  था  रमज़े  मुहब्बत  से  वो  वरना
दिल  के  लिए  थोड़ी  सी  इनायत  भी  बहुत  थी 
यूं  ही  नहीं  मश्हूरे ज़माना  मेरा  क़ातिल
उस  शख्स  को  इस  फन  में  महारत  भी  बहुत  थी 
क्या  दौरे ग़ज़ल  था  के  लहू  दिल  में  बहुत  था
और  दिल  को  लहू  करने  की  फुर्सत  भी  बहुत  थी 
हर  शाम  सुनाते  थे  हसीनों  को  ग़ज़ल  हम
जब  माल  बहुत  था  तो  सखावत  भी  बहुत  थी 
बुलावा  के  हम  'आजिज़ ' को  पशेमाँ  भी  बहुत  हैं
क्या  कीजिए  कमबख्त  की  शोहरत  भी  बहुत  थी 
Kaleem Aajiz

Saturday, June 18, 2011

मुझ से मिलना, बात करना, देखना, अच्छा लगा

बादलों  का  काफिला  आता  हुआ  अच्छा  लगा 
प्यास की धरती को हर सावन बड़ा  अच्छा  लगा 
उस  भरी  महफिल  में  उस  का  चंद  लम्हों  के  लिए 
मुझ  से  मिलना,  बात  करना, देखना, अच्छा  लगा 
जिन का सच होना किसी सूरत से भी मुमकिन न था 
ऎसी   ऎसी   बातें   अक्सर   सोचना   अच्छा  लगा 
वो तो क्या आता मगर खुशफहमियों के साथ साथ 
सारी  सारी   रात   हम   को   जागना   अच्छा  लगा 
पहले  पहले  तो  निगाहों  में  कोई  जचता  न  था 
रफ्ता  रफ्ता  दूसरा   फिर  तीसरा  अच्छा  लगा
Unknown

Wednesday, June 15, 2011

ये मीर अनीस की , आतिश की गुफ्तगू तो नहीं

मैं  वो  चराग़े  सरे  राह्गुज़ारे  दुनिया  हूँ 
जो अपनी ज़ात की तन्हाईयों में जल जाए 
Obaidullah Aleem
अज़ा  में  बहते  थे  आंसू  यहाँ , लहू  तो  नहीं 
ये  कोई  और  जगह  है  ये  लखनऊ  तो  नहीं 
यहाँ  तो  चलती  हैं  छुरियाँ  जुबान  से  पहले 
ये मीर अनीस की, आतिश की गुफ्तगू  तो नहीं 
चमक रहा है जो दामन पे दोनों फिरकों के 
बगौर  देखो  ये  इस्लाम  का  लहू  तो  नही
Kaifi Aazmi

Tuesday, June 14, 2011

अपनी नज़रों में हर इंसान सिकंदर क्यूँ है

आइना ये तो बताता है के मैं क्या हूँ लेकिन
आइना इस पे है खामोश के क्या है मुझ में 
Kishan Bihari Noor
हंस हंस के जवाँ दिल के हम क्यूँ न चुनें टुकड़े
हर शख्स की क़िस्मत में इनआम नहीं  होता
बहते हुए आंसू ने आखों से कहा थम कर
जो मए से पिघल जाए वो जाम नहीं होता
Meena Kumari 'Naaz'
आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है
ज़ख्म हर सर पे हर हाथ में पत्थर क्यूँ है
अपना अंजाम  तो मालूम है सब को फिर भी
अपनी नज़रों में हर इंसान सिकंदर क्यूँ है
ज़िन्दगी जीने के काबिल ही नहीं अब फाखिर
वरना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है
Sudarshan Faakhir

कितने जलवों से उलझती हैं निगाहें अपनी

बुतों  की  तरहा सलातीने दहेर  हैं ख़ामोश
 न सामेआ की है क़ुव्वत न क़ुव्वते गुफ्तार 
Aziz Lucknowi
वो भी क्या  लोग  थे आसान थी राहें जिनकी 
बंद  आँखें  किये  इक  सिम्त  चले  जाते  थे 
अक्लो दिल ख्वाबो हकीक़त की न उलझन न ख़लिश 
मुख्तलिफ़  जलवे  निगाहों  को  न  बहलाते  थे
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सफ़र आसान था तो मंजिल भी बड़ी रौशन थी 
आज किस दर्जा पुरअसरार हैं राहें अपनी
कितनी परछाईयाँ आती हैं तजल्ली बनकर
कितने जलवों से उलझती हैं निगाहें अपनी
Aale Ahmad Suroor 

Sunday, June 5, 2011

मैं ने औरों से सुना है के परेशान हूँ मैं

क्यूँ मशअले दिल फैज़ छुपाओ तहे दामाँ
बुझ जाएगी यूँ  भी   के हवा तेज़ बहुत है
Faiz Ahmad Faiz
अपनी हालत का खुद एहसास नहीं है मुझको
 मैं  ने  औरों  से सुना  है   के  परेशान   हूँ  मैं
Aasi Lucknowi
हयात  जिस  की  थी  उसको  लौटा दी
मैं आज चैन से सोता हूँ पाओं  फैला कर
Hafeez Meruthee
दोस्त बन जाएगा वोह दुश्मन भी
हम  जो  बढ़कर  उसे सलाम करें
जब भी हम रेगज़ार से गुजरें
ख़ुश्क फूलों का एहतेराम करें
Maraaq Mirza
आश्याने की मेरे हकीकत न पूछ
चार तिनके थे ,ज़ेरो ज़बर हो गए
Jameel Murassapuri   

Wednesday, June 1, 2011

जिनका ईमान खजूरों के बराबर निकला

मैं  तो  फरयाद  भी  करने  नहीं  दर  दर  निकला
दर्द  की  आह  भी  सीने  में  दबा  कर  निकला
आंसुओं   को  मेरे  शिक्वाह  न  समझ  ले  कोई
जब भी  बाज़ार  में  निकला  तो  संभल  कर  निकला
याद  ने  उस  घडी दिल  पर  बड़ी  दस्तक  दी  है
चौदहवीं   रात  में  जब  चाँद  उभर  कर  निकला
चाँद  सूरज  का  निकलना  तो  तिरा  सदका  है
हाँ  मगर  तू  अभी  परदे  से न  बाहर  निकला
ज़िक्रे  शब्बीर  फरिश्तों  से  भी  तुला  न  गया
कसरे  जन्नत  मिरे  अश्कों   के  बराबर  निकला
कुल्ले  ईमान  की  मसनद  पे  उन्हें  लाए  हैं
 जिनका  ईमान  खजूरों  के  बराबर  निकला

Monday, April 4, 2011

एक मुद्दत से तेरी याद भी आई न हमें

क्या ख़बर उनको के दामन भी भड़क उठते हैं
जो ज़माने की हवाओं से बचाते हैं चराग़
Ahmad Faraaz
एक आफत से तो मर मर के हुआ था जीना
पड़ गई और यह कैसी मेरे अल्लाह नई
Mir Soz
एक मुद्दत से तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे, ऐसा भी नहीं
Firaaq Gorakhpuri
शिकम की आग लिए फिर रही है शहर बा शहर
सगे ज़माना हैं, हम क्या हमारी हिजरत क्या
Iftekhar Aarif   

Friday, April 1, 2011

क्या करेगा अगर सहर न हुई

दुनिया से जा रहा हूँ  कफ़न  में छुपाए मुंह 
अफसोस  बाद  मरने  के  आई  हमें हया
Unknown
हिज्र  की  रात  काटने वाले 
क्या करेगा अगर सहर न हुई
 Unknown

Thursday, March 31, 2011

हम लोग रौशनी में बड़े बा वक़ार है

अहले  महशर देख लूं  क़ातिल को तो पहचान लूं
भोली भाली शक्ल थी और कुछ भला सा नाम था
Saael Dehlavi
चलकर कभी हमारे अँधेरे भी देखिए
हम लोग  रौशनी  में बड़े बा वक़ार है
Tasleem Farooqi
कुछ  तो मजबूरियां रही होंगी
यूँ  कोई  बेवफा  नहीं  होता
Bahsir Badr 
यह कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह
कोई  चारा साज़ होता कोई  ग़मगुसार होता
Mirza Ghaalib

Sunday, March 27, 2011

कागज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के

हम गुज़िश्ता सोहबतों को याद करते जाएंगे
आने वाले दौर भी यूहीं गुज़रते जाएँगे
Aziz Lucknowi
ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना, हामी भर लेना
बहुत हैं  फाएदे इस में , मगर अच्छा नहीं लगता
Jaaved Akhtar
किस तरह जमआ कीजिए अब अपने आप को
कागज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के
Aadil Mansuri
शेख जी खुद को करामात बनाए रख्खें 
आलिम हूँ मैं भी इक बज़्म सजाए रख्खें
रात भर वाज़ का मस्जिद में बजा कर केसिट
खुद तो सो जाएँ मोहल्ले को जगाए रख्खें
Sadiq Naseem
इस तरह ख्वाब मेरे हो गए रेज़ा रेज़ा
इस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई

अब तो इस राह से वोह शख्स गुज़रता भी नहीं
अब किस उम्मीद से दरवाज़े से झांके कोई

शेहरे वफ़ा में धूप का साथी नहीं कोई
सूरज सरों पे आया तो साए भी घट गए
Parveen Shaakir

Thursday, March 24, 2011

यह मुंबई किसी सहरा में इक चट्टान सा है

महक न फूलों की इस में न पंछियों की चमक
यह  मुंबई  किसी सहरा  में  इक चट्टान सा है

लगाकर  कान  कब्रस्तान  में सुन
के है ज़ेरे ज़मीं कोहराम क्या क्या

यह औरत और पानी एक से औसफ के हामिल
बना  लेते  हैं दोनों रफ्ता रफ्ता  रास्ता  अपना
Irtiza Nishaat 

Wednesday, March 23, 2011

शौक़ जीने का है मुझ को मगर इतना तो नहीं

बेताब  सिर्फ  हाथ  उठाने  की  देर  है
पत्थर निचोड़ सकते हैं मेहनत कशों के हाथ
Betab Nizampuri 
पामाल हम हुए न फ़क़त जौरे चर्ख़ से
आई हमारी जान पे आफत कई तरह
Momin Khan Momin
ज़िन्दगी तुझ से हर एक सांस पे समझौता करूँ
शौक़ जीने का है मुझ को मगर इतना तो नहीं
Muzaffar Waarsi

Sunday, March 20, 2011

मज़्हबे इश्क़ इख्तेआर किया

पतंगे जल गए हारिज कोई रहा नहीं अब
कहो चराग़ से ता सुब्ह बा फ़राग जले 
Shah Torab Kaakorwi
उस के इफाए अहेद तक न जिए 
उम्र   ने   हम  से  बेवफाई   की 

सख्त काफिर था जिस ने पहले मीर
मज़्हबे    इश्क़   इख्तेआर   किया 
Mir Taqi Mir 

Friday, March 18, 2011

वह तो सूरज है जहाँ जाएगा, दिन निकलेगा

वह तो सूरज है जहाँ जाएगा, दिन निकलेगा
रात देखी हो तो समझे के अँधेरा क्या है
Ismat Parvez
शिकवए ज़ुल्मते  शब् से तो कहीं बेहतर था
अपने हिस्से की कोई शमआ जलाते जाते
  Ahmad Faraaz

Tuesday, March 15, 2011

नेज़े की नोक पर मुझे हर सर दिखाई दे

बाहर से जो मकान अभी घर दिखाई दे
देखूं अगर मकीन तो खंडहर दिखाई दे
यह ज़ीस्त है या आतिशे नमरूदे वक़्त है
हर गाम मुझे इक नया महशर दिखाई दे
तनहाई में टूटे तो फलक से गिरें आंसू
वोह शख्स देखने में जो पत्थर दिखाई दे
यूँ फन फैलाए बैठी है फिर से यज़ीदिअत
नेज़े की नोक पर मुझे हर सर दिखाई दे
दहशत भरी फ़ज़ा में घिरा सोच रहा हूँ
यूँ रोऊँ के दिल सीने से बाहर दिखाई दे
Mohammad Nawaaz

Thursday, March 10, 2011

इस अदाकारी में हैं उस्ताद सब

सबको दावा-ए-वफ़ा, सबको यक़ीं
इस अदाकारी में हैं उस्ताद सब

शहर के हाकिम का ये फ़रमान है

क़ैद में कहलायेंगे आज़ाद सब 
Javed Akhtar

उठ उठ के देखती रही गरदे सफ़र मुझे

पूरा भी होके जो कभी पूरा न हो सका
तेरी निगाह का वो तकाज़ा है आज तक
Feraaq Gorakhpuri
हयातो मौत भी अदना सी इक कड़ी मेरी
अज़ल से लेके अबद तक वोह सिलसिला हूँ मैं
Asghar Gondawi
दामन झटक के वादिए  ग़म से गुज़र गया
उठ उठ के देखती रही गरदे सफ़र मुझे
Ali Sardar Jafri
दोहराता  नहीं मैं भी गए लोगों की बातें 
इस दौर को निस्बत भी कहानी से नहीं है
Shahryar

Wednesday, March 9, 2011

ला अपना हाथ दे मेरे दस्ते सवाल में

यूँ ही मौसम की अदा देख के याद आया है
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्सां जानां
Ahmad Faraaz
कुछ और माँगना मेरे मशरब में कुफ्र है
ला अपना हाथ दे मेरे दस्ते सवाल में
Siraj Lucknowi
कोई फूलों से सीखे सर्फराज़े ज़िन्दगी होना
वहीँ से फिर महकते हैं जहां से ख़ाक होते हैं
Shifa Gwaliori
कितनी दीवारें उठी हैं एक घर के दरमियाँ 
रास्ते गुम हो गए दीवारो दर के दरमियाँ 
Makhmoor Saeedi 

Monday, March 7, 2011

बड़ी बारीक हैं वाइज़ की चालें

अजब वाइज़ की दीँदारी है  या  रब
अदावत  है  इसे  सारे जहाँ  से

कोई  अब  तक  न  ये  समझा  क  इन्सां
कहाँ  जाता  है  आता  है  कहाँ  से  
 
वहीँ  से  रात  को  ज़ुल्मत  मिली  है
चमक  तारों  ने  पाई  है  जहाँ  से

हम  अपनी  दर्दमंदी  का  फ़साना
सुना  करते  हैं  अपने  राजदां  से

बड़ी  बारीक  हैं  वाइज़ की  चालें
लरज़  जाता  है  आवाज़े अजाँ  से  
Allama Iqbal

हर नक्शे पा बुलंद है दीवार की तरह

ऐ दोस्त हम ने तरके मोहब्बत के बावोजूद
महसूस की है तेरी मोहब्बत कभी कभी
Hayaat Amrohi
मिला है जब से लुत्फे ख़ाकसारी
तनज्जुल  में तरक्की कर रहा हूँ
 Amjad Hyderabadi
बे तीशाए नज़र न चलो राहे रफ्तागां 
हर नक्शे पा बुलंद है दीवार की तरह
Majrooh Sultanpuri 
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं
Nida Fazli

Saturday, March 5, 2011

दस्ते क़ातिल को झटक देने की तौफ़ीक़ मिले

आईये   हाथ   उठायें   हम   भी 
हम  जिन्हें  रस्मे दुआ  याद नहीं 
हम जिन्हें सोज़े मोहब्बत के सिवा 
कोई  बुत, कोई  ख़ुदा याद  नहीं 

आईये  अर्ज़  गुजारें  कि  निगारे हस्ती 
ज़हरे इमरोज़  में  शीरीनीए फ़र्दा  भर  दे 
वो  जिन्हें  ताबे गरां बारीए अय्याम  नहीं 
उनकी पलकों पे शबो रोज़ को  हल्का कर दे

जिनकी आँखों को रुख़े सुब्ह का यारा भी नहीं 
उनकी  रातों  में  कोई  शमआ मुनव्वर कर  दे 
जिनके क़दमों को किसी रह का सहारा भी नहीं 
उनकी  नज़रों  पे  कोई  राह  उजागर  कर  दे

जिनका  दीँ  पै रवीए किज़्बो रिया  है  उनको 
हिम्मते कुफ्र  मिले, जुरआते तहकीक  मिले 
जिनके  सर  मुन्ताज़िरे तेग़े जफा  हैं  उनको 
दस्ते क़ातिल को झटक देने की तौफ़ीक़ मिले 

इश्क़ का सिररे निहाँ जान तपाँ  है जिस से 
आज  इकरार  करें  और  तपिश  मिट  जाए 
हर्फे हक दिल में खटकता है जो कांटे की तरह 
आज  इज़हार  करें  और  ख़लिश  मिट  जाए  
 
Faiz Ahmad Faiz - 14 August 1967