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Wednesday, June 22, 2011

जब माल बहुत था तो सखावत भी बहुत थी

ज़ालिम   था  वो  और  ज़ुल्म  की  आदत  भी  बहुत  थी
मजबूर  थे  हम  उस  से  मुहब्बत  भी  बहुत  थी 
उस  बुत  के  सितम  सह  के  दिखा  ही  दिया  हम  ने
गो  अपनी  तबिय्यत  में  बग़ावत  भी  बहुत  थी
वाकिफ़  ही  न  था  रमज़े  मुहब्बत  से  वो  वरना
दिल  के  लिए  थोड़ी  सी  इनायत  भी  बहुत  थी 
यूं  ही  नहीं  मश्हूरे ज़माना  मेरा  क़ातिल
उस  शख्स  को  इस  फन  में  महारत  भी  बहुत  थी 
क्या  दौरे ग़ज़ल  था  के  लहू  दिल  में  बहुत  था
और  दिल  को  लहू  करने  की  फुर्सत  भी  बहुत  थी 
हर  शाम  सुनाते  थे  हसीनों  को  ग़ज़ल  हम
जब  माल  बहुत  था  तो  सखावत  भी  बहुत  थी 
बुलावा  के  हम  'आजिज़ ' को  पशेमाँ  भी  बहुत  हैं
क्या  कीजिए  कमबख्त  की  शोहरत  भी  बहुत  थी 
Kaleem Aajiz

Tuesday, June 14, 2011

अपनी नज़रों में हर इंसान सिकंदर क्यूँ है

आइना ये तो बताता है के मैं क्या हूँ लेकिन
आइना इस पे है खामोश के क्या है मुझ में 
Kishan Bihari Noor
हंस हंस के जवाँ दिल के हम क्यूँ न चुनें टुकड़े
हर शख्स की क़िस्मत में इनआम नहीं  होता
बहते हुए आंसू ने आखों से कहा थम कर
जो मए से पिघल जाए वो जाम नहीं होता
Meena Kumari 'Naaz'
आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है
ज़ख्म हर सर पे हर हाथ में पत्थर क्यूँ है
अपना अंजाम  तो मालूम है सब को फिर भी
अपनी नज़रों में हर इंसान सिकंदर क्यूँ है
ज़िन्दगी जीने के काबिल ही नहीं अब फाखिर
वरना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है
Sudarshan Faakhir

Sunday, June 5, 2011

मैं ने औरों से सुना है के परेशान हूँ मैं

क्यूँ मशअले दिल फैज़ छुपाओ तहे दामाँ
बुझ जाएगी यूँ  भी   के हवा तेज़ बहुत है
Faiz Ahmad Faiz
अपनी हालत का खुद एहसास नहीं है मुझको
 मैं  ने  औरों  से सुना  है   के  परेशान   हूँ  मैं
Aasi Lucknowi
हयात  जिस  की  थी  उसको  लौटा दी
मैं आज चैन से सोता हूँ पाओं  फैला कर
Hafeez Meruthee
दोस्त बन जाएगा वोह दुश्मन भी
हम  जो  बढ़कर  उसे सलाम करें
जब भी हम रेगज़ार से गुजरें
ख़ुश्क फूलों का एहतेराम करें
Maraaq Mirza
आश्याने की मेरे हकीकत न पूछ
चार तिनके थे ,ज़ेरो ज़बर हो गए
Jameel Murassapuri   

Thursday, March 31, 2011

हम लोग रौशनी में बड़े बा वक़ार है

अहले  महशर देख लूं  क़ातिल को तो पहचान लूं
भोली भाली शक्ल थी और कुछ भला सा नाम था
Saael Dehlavi
चलकर कभी हमारे अँधेरे भी देखिए
हम लोग  रौशनी  में बड़े बा वक़ार है
Tasleem Farooqi
कुछ  तो मजबूरियां रही होंगी
यूँ  कोई  बेवफा  नहीं  होता
Bahsir Badr 
यह कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह
कोई  चारा साज़ होता कोई  ग़मगुसार होता
Mirza Ghaalib

Sunday, March 27, 2011

कागज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के

हम गुज़िश्ता सोहबतों को याद करते जाएंगे
आने वाले दौर भी यूहीं गुज़रते जाएँगे
Aziz Lucknowi
ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना, हामी भर लेना
बहुत हैं  फाएदे इस में , मगर अच्छा नहीं लगता
Jaaved Akhtar
किस तरह जमआ कीजिए अब अपने आप को
कागज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के
Aadil Mansuri
शेख जी खुद को करामात बनाए रख्खें 
आलिम हूँ मैं भी इक बज़्म सजाए रख्खें
रात भर वाज़ का मस्जिद में बजा कर केसिट
खुद तो सो जाएँ मोहल्ले को जगाए रख्खें
Sadiq Naseem
इस तरह ख्वाब मेरे हो गए रेज़ा रेज़ा
इस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई

अब तो इस राह से वोह शख्स गुज़रता भी नहीं
अब किस उम्मीद से दरवाज़े से झांके कोई

शेहरे वफ़ा में धूप का साथी नहीं कोई
सूरज सरों पे आया तो साए भी घट गए
Parveen Shaakir

Thursday, March 24, 2011

यह मुंबई किसी सहरा में इक चट्टान सा है

महक न फूलों की इस में न पंछियों की चमक
यह  मुंबई  किसी सहरा  में  इक चट्टान सा है

लगाकर  कान  कब्रस्तान  में सुन
के है ज़ेरे ज़मीं कोहराम क्या क्या

यह औरत और पानी एक से औसफ के हामिल
बना  लेते  हैं दोनों रफ्ता रफ्ता  रास्ता  अपना
Irtiza Nishaat 

Wednesday, March 23, 2011

शौक़ जीने का है मुझ को मगर इतना तो नहीं

बेताब  सिर्फ  हाथ  उठाने  की  देर  है
पत्थर निचोड़ सकते हैं मेहनत कशों के हाथ
Betab Nizampuri 
पामाल हम हुए न फ़क़त जौरे चर्ख़ से
आई हमारी जान पे आफत कई तरह
Momin Khan Momin
ज़िन्दगी तुझ से हर एक सांस पे समझौता करूँ
शौक़ जीने का है मुझ को मगर इतना तो नहीं
Muzaffar Waarsi

Tuesday, March 15, 2011

नेज़े की नोक पर मुझे हर सर दिखाई दे

बाहर से जो मकान अभी घर दिखाई दे
देखूं अगर मकीन तो खंडहर दिखाई दे
यह ज़ीस्त है या आतिशे नमरूदे वक़्त है
हर गाम मुझे इक नया महशर दिखाई दे
तनहाई में टूटे तो फलक से गिरें आंसू
वोह शख्स देखने में जो पत्थर दिखाई दे
यूँ फन फैलाए बैठी है फिर से यज़ीदिअत
नेज़े की नोक पर मुझे हर सर दिखाई दे
दहशत भरी फ़ज़ा में घिरा सोच रहा हूँ
यूँ रोऊँ के दिल सीने से बाहर दिखाई दे
Mohammad Nawaaz

Monday, March 7, 2011

बड़ी बारीक हैं वाइज़ की चालें

अजब वाइज़ की दीँदारी है  या  रब
अदावत  है  इसे  सारे जहाँ  से

कोई  अब  तक  न  ये  समझा  क  इन्सां
कहाँ  जाता  है  आता  है  कहाँ  से  
 
वहीँ  से  रात  को  ज़ुल्मत  मिली  है
चमक  तारों  ने  पाई  है  जहाँ  से

हम  अपनी  दर्दमंदी  का  फ़साना
सुना  करते  हैं  अपने  राजदां  से

बड़ी  बारीक  हैं  वाइज़ की  चालें
लरज़  जाता  है  आवाज़े अजाँ  से  
Allama Iqbal

हर नक्शे पा बुलंद है दीवार की तरह

ऐ दोस्त हम ने तरके मोहब्बत के बावोजूद
महसूस की है तेरी मोहब्बत कभी कभी
Hayaat Amrohi
मिला है जब से लुत्फे ख़ाकसारी
तनज्जुल  में तरक्की कर रहा हूँ
 Amjad Hyderabadi
बे तीशाए नज़र न चलो राहे रफ्तागां 
हर नक्शे पा बुलंद है दीवार की तरह
Majrooh Sultanpuri 
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं
Nida Fazli

Saturday, March 5, 2011

दस्ते क़ातिल को झटक देने की तौफ़ीक़ मिले

आईये   हाथ   उठायें   हम   भी 
हम  जिन्हें  रस्मे दुआ  याद नहीं 
हम जिन्हें सोज़े मोहब्बत के सिवा 
कोई  बुत, कोई  ख़ुदा याद  नहीं 

आईये  अर्ज़  गुजारें  कि  निगारे हस्ती 
ज़हरे इमरोज़  में  शीरीनीए फ़र्दा  भर  दे 
वो  जिन्हें  ताबे गरां बारीए अय्याम  नहीं 
उनकी पलकों पे शबो रोज़ को  हल्का कर दे

जिनकी आँखों को रुख़े सुब्ह का यारा भी नहीं 
उनकी  रातों  में  कोई  शमआ मुनव्वर कर  दे 
जिनके क़दमों को किसी रह का सहारा भी नहीं 
उनकी  नज़रों  पे  कोई  राह  उजागर  कर  दे

जिनका  दीँ  पै रवीए किज़्बो रिया  है  उनको 
हिम्मते कुफ्र  मिले, जुरआते तहकीक  मिले 
जिनके  सर  मुन्ताज़िरे तेग़े जफा  हैं  उनको 
दस्ते क़ातिल को झटक देने की तौफ़ीक़ मिले 

इश्क़ का सिररे निहाँ जान तपाँ  है जिस से 
आज  इकरार  करें  और  तपिश  मिट  जाए 
हर्फे हक दिल में खटकता है जो कांटे की तरह 
आज  इज़हार  करें  और  ख़लिश  मिट  जाए  
 
Faiz Ahmad Faiz - 14 August 1967

Friday, March 4, 2011

दीवार क्या गिरी मेरे कच्चे मकान की

किसी का कब कोई रोज़े सियाह में साथ देता है 
के तारीकी में साया भी जुदा रहता है इन्सां से 
Imam Baksh Naasikh 
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दीवार क्या गिरी मेरे कच्चे मकान की 
लोगों ने मेरे सहन में रस्ते बना लिए 
Saba Lucknowi

Thursday, February 24, 2011

न गिला है दोस्तों का, न शिकायते ज़माना

तेरी बंदा परवरी से मेरे दिन गुज़र रहे हैं
न गिला है दोस्तों का, न शिकायते ज़माना 
Allama Iqbal 
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गए थे ज़ोम में अपने ,पर उस को देखते ही 
जो दिल ने हम से कहे थे पयाम, भूल गए
Shah Zahooruddin Haatim
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सुबह होती है शाम होती है
उम्र यूँही तमाम होती है
Ameerullah Tasleem 

Tuesday, February 22, 2011

कोई महरम नहीं मिलता जहां में

हर वक़्त का हँसना तुझे बर्बाद न करदे 
तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर
Mohsin Naqvi
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रोज़ मामूरए हस्ती में खराबी है ज़फर
ऐसी बस्ती से तो वीराना बनाया होता
Bahadur Shah Zafar
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कोई महरम नहीं मिलता जहां में
मुझे कहना है कुछ अपनी ज़बां में
Altaf Husain Haali
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इरादे बांधता हूँ सोचता हूँ तोड़ देता हूँ
कहीं ऐसा न हो जाए कहीं वैसा न हो जाए
Hafeez Jaalandhari